तुम ज़माने से नहीं तुमसे ये जमाना है !

I have written this poem to encourage one of  my friend. He has two girl children and he is happy with them. But people often make him realize the lack of son. so please read it and tell me your valuable thoughts about this………

बहुत ही ना समझ ये सारा जमाना है,

इसने कब जिन्दगी को करीब से जाना है.

खुश हैं वो बेटों से पिटकर भी पर कब,

बेटियों को दिल के बहुत करीब माना है .

बोझ नहीं हैं वो यही दुनिया को समझाना है,

ज़माने वो तुझसे नहीं हैं उनसे ही तो जमाना है .

माँ बाप बेटियों के याद रखना मेरे अल्फाजों को,

बेटे वालों से ज्यादा सुकून जिन्दगी में तुमने पाना है.

सो देना हौसले बेटियों को न उन्हें हीन बनाना है,

उड़ सके गगन में खुल के इतना सबल बनाना है.

ना मारी जाये आने से पहले ना उन्हें जिन्दा जलाना है,

खूब करिये तारीफें उसकी उसे भी कुछ करके दिखाना है.

हर पल बनना उसकी हिम्मत उसका हक उसे दिलवाना है,

भावों से है वो भरी हुयी उसे बेटों से बड़ा फर्ज निभाना है.

कोटि कोटि नमन है मेरा तुम्हें ‘ओ’ नारी शक्ति!!

तुम ज़माने से नहीं  तुमसे ही तो जमाना है !!!

My freinds now tell me is this not the truth  ???

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